प्राचीन भारतीय इतिहास का प्रस्तर युग | सम्पूर्ण जानकारी

इतिहासकारों ने भारत के प्राचीन इतिहास को तीन काल खण्डों में बाँटा हैं। वह काल जिसकी जानकारी के लिए लिखित साधन का अभाव है तथा जिसमें मानव असभ्य जीवन जी रहा था, को ‘प्रागैतिहासिक काल’ की संज्ञा दी गई। इस काल के बारे में जानकारी पत्थर के उपकरणों, खिलौनों, मिट्टी के बर्तनों आदि से मिलती है।

  • जिस काल की जानकारी के स्रोत के रूप में लिखित साधन उपलब्ध हैं तथा जिसमें मानव सभ्य हो चुका था को ऐतिहासिक काल’ की संज्ञा दी गई।

  • प्राचीन भारत के इतिहास का एक ऐसा भी काल था जिसकी जानकारी के स्रोत के रूप में लिखित साक्ष्य उपलब्ध है, परन्तु उनकी गूढ़ लिपि को पढ़ने में अभी तक कोई इतिहासकार सफल नहीं हुआ। इतिहास के इस काल को’ आद्य इतिहास’ की संज्ञा दी गई।

  • हड़प्पा तथा वैदिक काल की सभ्यता का अध्ययन ‘ आद्य ऐतिहासिक काल’ के अन्तर्गत किया जाता है।


प्रस्तर युग





    • मनुष्य की सभ्यता के प्रारम्भिक काल को ‘पाषाणकाल’ के नाम से जाना जाता है। हमारी पृथ्वी लगभग 400 करोड़ वर्ष पुरानी है जिसकी परतें विकास की चार अवस्थाओं से गुजर चुकी हैं। चौथी अवस्था को अतिनूतन (प्लाइस्टोसीन) तथा अद्यतन (होलोसीन) दो हिस्सों में बाँटा जाता है।

    • सम्भवत: मानव का अस्तित्व पृथ्वी पर अत्तिनूतन काल के आरम्भ में हुआ।

    • भारत में पुरा पाषाण युगीन सभ्यता का विकास प्लाइस्टोसीन या हिम युग से हुआ।





  • प्रस्तर युग या पाषाण युग को मानव द्वारा प्रयोग में लाये गये पत्थर के उपकरणों की बनावट तथा जलवायु में होने वाले परिवर्तन के आधार पर तीन भागों में बाँटा जा सकता है



  1. पुरा पाषाण काल (Paleolithic Age) 2. मध्य पाषाण काल (Mesolithic Age) 3. उत्तर अथवा नव पाषाण काल . (neolithic Age)



  • पुरा पाषाण काल में मानव शरीर के अवशेषों का अभाव रहा है। हिमयुग का अधिकांश हिस्सा इसी काल से गुजरा। इस काल में ‘चापर-चापिंग’ (पेबुला) परम्परा के अन्तर्गत गोल पत्थरों को तोड़कर हथियार बनाये गये, जिसके अवशेष पंजाब की सोहन नदी घाटी से मिलते हैं।

  • हस्त कुठार (हैण्ड ऐक्स) परम्परा के हथियार मद्रास से प्राप्त हुए हैं। मद्रास के अतिरिक्त इस काल के औजारों के अवशेष मिर्जापुर (उ० प्र०) के बेलन घाटी, दिदवाना (राजस्थान) तथा नर्मदा नदी की घाटी से प्राप्त होते हैं। भीमबेतका (मध्य प्रदेश) की गुहाओं में तत्कालीन मनुष्यों के आवास के अवशेष मिले हैं।

  • इस युग का मानव आग से अनभिज्ञ था। कच्चा मांस अथवा फल-फूल खाया करता था। स्थायी निवास के अभाव में इस समय का मानव खानाबदोश का जीवन जीता था। कृषि कर्म तथा पशुपालन से विमुख इस समय का मानव पूर्णत: आखेटक का जीवन जीता था।

  • मध्यपाषाण काल के लोग शिकार करने, मछली पकड़ने, खाद्य-सामग्री को एकत्र करने के साथ-साथ पशुपालन भी करने लगे। मध्य प्रदेश के ‘आदमगढ़ तथा राजस्थान के बागोर’ से पशुपालन के सबसे पुराने साक्ष्य मिलते हैं। इस काल में शिकार में प्रयुक्त होने वाले औजार बहुत छोटे होते थे, जिन्हें ‘माइक्रोलिथ’ (लघु पाषाणों पकरण) कहा जाता था। छोटे आकार के पत्थरों से निर्मित उपकरण राजस्थान, गुजरात, मालवा, पश्चिमी बंगाल, आंध्रप्रदेश तथा मैसूर से प्राप्त हुए हैं।

  • सम्भवत: पहला मानव अस्थिपंजर मध्य पाषाण में ही मिला। प्रतापगढ़ के ‘सरायनाहरराय’ तथा ‘महदहा’ नामक स्थान से मध्य पाषाणकाल के प्रथम मानव अस्थिपंजर मिले। इस काल में मानव थोडा बहुत कृषि कर्म तथा बर्तन निर्माण कला से भी परिचित होने लगा था। मध्य पाषाण काल में ही भारत में गुफा चित्रकारी के अवशेष मिले हैं। विंध्याचल की गुफाओं में अनेक आखेट, नृत्य एवं युद्ध से संबंधित प्रगैतिहासिक चित्र मिले हैं।

  • सम्भवतः इस काल के लोग अन्त्येष्टि क्रिया से भी परिचित थे। | ‘नवपाषाण युग’ के लोग पालिशदार पत्थर के औजारों तथा हथियारों का प्रयोग करते थे। इस समय के औजारों में कुल्हाड़ी का महत्वपूर्ण स्थान था।

  • ‘ले मेसुरियर महोदय’ ने 1860 में टोंस नदी की घाटी से प्रथम नव पाषाण उपकरण प्राप्त किया। उत्तर-पश्चिम में स्थित कश्मीर में नवपाषाण संस्कृति की कई विशेषताएं देखने को मिलती हैं, जिसमें मुख्य है गर्तनिवास । श्रीनगर के बुर्जाहोम’ (जन्मस्थान) नामक स्थान पर इस काल के लोग | झील के किनारे गर्तावासों (गड्ढों) में रहते थे।

  • गर्तनिवास का एक और स्थान था ‘गुफकराल जो श्रीनगर से 41 कि० मी० दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। यहाँ के लोग कृषि और पशुपालन दोनों करते थे।

  • नवपाषाण युग के लोग हड्डी द्वारा बने हथियारों का भी प्रयोग करते थे। हड्डी के हथियार पटना (बिहार) के चिरौद नामक स्थान से प्राप्त हुए हैं। बुर्जाहोम के लोग रूखड़े धूसर मृदभाण्ड का भी प्रयोग करते थे। यहाँ कब्रों में मालिकों के साथ उनके कुत्तों को भी दफनाया जाता था। सम्भवत: यह परम्परा इस काल में अन्यत्र देखने को नहीं मिली। नव पाषाण युग की मुख्य उपलब्धि थी खाद्य उत्पादन का आविष्कार, पशुओं के प्रयोग की जानकारी, स्थिर ग्रामीण जीवन आदि। कृषि का प्रथम स्पष्ट साक्ष्य नव पाषाण युग में ही सिंध और बलूचिस्तान की सीमा पर कच्छी मैदान में बोलन नदी के तट पर स्थित ‘मेहरगढ़’ नामक स्थान से प्राप्त हुआ है।

  • यहाँ के लोगों द्वारा गेहूँ, जौ और कपास पैदा करने का अनुमान लगाया जा सकता है। सम्भवत: ये कच्चे ईंटों से निर्मित घरों में रहते थे। इलाहाबाद के ‘कोल्डीहवा’ स्थान से चावल की खेती के प्राचीनतम साक्ष्य मिलते हैं। कुम्भकारी की स्पष्ट शुरुआत इसी काल में हुई।


प्रस्तर युग के बारे में 15 महत्वपूर्ण तथ्य | 15 Important Facts about Stone era in Hindi






स्मरणीय तथ्य  


  1. इतिहास के जिस काल की जानकारी के लिए लिखित साधन का अभाव है तथा मानव असभ्य जीवन जी रहा था उसे प्रागैतिहासिक काल कहा जाता है

  2. जिस काल की जानकारी के लिए लिखित साधन तो उपलब्ध हैं परंतु उसे पढ़ा नहीं जा सकता उसे आद्य इतिहास कहा जाता है हडप्पा का इतिहास काल है

  3. इतिहास किए जिस काल की जानकारी के स्रोत के रूप में लिखित साधन उपलब्ध हैं उसे ऐतिहासिक काल कहा जाता है

  4. मानव का अस्तित्व पृथ्वी पर अति नूतन काल के आरंभ में हुआ था

  5. गर्त आवास का साक्ष्य गुफ्फ्कर्ल, बुर्जहोम तथा  नागार्जुनकोंडा से मिला है

  6. बेलन घाटी क्षेत्र पुरापाषाण काल के तीनों चरणों से जुड़ा है

  7. भीमबेटका से गुफा चित्रकारी के साक्ष्य मिले हैं

  8. मध्य प्रदेश के आजमगढ़ तथा राजस्थान के बागोर से पशुपालन के सबसे पुराने साक्ष्य मिले हैं

  9. मेहरगढ़ से सर्व प्रथम कृषि का साक्ष्य मिला है

  10. नव पाषाण युग के हथियार बिहार के चिरांद नामक स्थान से प्राप्त हुए हैं

  11. इलाहाबाद के कोल्डीहवा स्थान से चावल की खेती के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं

  12. गर्तचूल्हे का प्राचीन साक्ष्य लंघनाज तथा सराय नाहर राय से मिला है

  13. कुपगल तथा काडेकल से राख का टीला मिला है

  14. मृदभांड निर्माण का प्राचीनतम साक्ष्य जो चौपानी मांडो से मिला है

  15. मनुष्य के साथ पालतू पशु को दफनाने का साक्ष्य बुर्जहोम से मिला है

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